kripa shankar
Tuesday, 25 August 2020
Thursday, 11 July 2013
हर शाख पैर उल्लू बैठें हैं?नहीं बैठेंगे ......................
समय शाम के तीन बजे,आगरा जेल,मुख़्तार अंसारी परेशान, समय शाम के पांच बजे,तिहाड़ जेल,ब्रजेश सिंह परेशान.परेशानी का सबब ? 2009 के चुनाव में वाराणसी से मुख्तार अंसारी जीत ही गए होते,अगर उनके खिलाफ और लोगों ने लामबंदी ना की होती,तो क्या यह मान लिया जाये की लोक तंत्र इनके साथ है,ब्रजेश सिंह चंदौली से 2014 चुनाव की वैतरणी पार करके लोक सभा पहुंचना चाहते हैं.पीवी नरसिंह राव और शिबू सोरेन। एक देश का प्रधानमंत्री तो दूसरा प्रधानमंत्री की कुर्सी बनाये रखने के लिये करोड़ रुपये की घूस लेने वाला। और अदालत ने दोनों को ही दोषी करार दिया। लेकिन इतिहास में नरसिंह राव अल्पमत में होते हुये भी पांच बरस तक सत्ता चलाने वाले पीएम माने गये और शिबू सोरेन उसके बाद से कभी चुनाव हारे नहीं ।
तो क्या सुप्रीम कोर्ट जिस राजनीतिक व्यवस्था को पाक साफ करने के लिये दागी राजनेताओं को रोकना चाहता, उसी राजनीतिक व्यवस्था में ऐसा खोट आ चुका है कि दोषी होने के पहले रास्ते से बचने को ही राजनेता एड़ी चोटी का जोर लगाने लगेंगे। यह सवाल जयललिता से लेकर लालू यादव और फूलन देवी से लेकर राजा भैया तक के केस से समझा जा सकता है।
क्योंकि 13 बरस पहले जयललिता को 3 बरस की सजा निचली अदालत ने सुनायी। लेकिन जयललिता मामले को हाई कोर्ट में ले गयी और आज तक उन्हें जेल जाने की नौबत नहीं आयी है। बीते एक दशक से लालू यादव चारा घोटाला में आरोपी हैं लेकिन फैसला आजतक नहीं आ पाया है। फूलन देवी हत्या से लेकर अपहरण और फिरौती से लेकर जातीय नरसंहार तक में दोषी करार देने के बाद भी संसद पहुंची और ठसक से विशेषाधिकार का लाभ उठाती रहीं। राजा भैया कई आरोपों में दोषी होने के बाद और जेल जाने के बाद भी सत्ता की सारी सुविधाओं को ना सिर्फ भोगते रहे बल्कि दोबारा चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक साख को और मजबूत बना गये। और इस प्रकिया को मौजूदा लोकसभा के सांसदों ने कितना मजबूत किया है यह नेशनल इलेक्शन वाच की रिपोर्ट से समझा जा सकता है। जो बताती है कि लोकसभा में 150 सांसद दागी है। और दागियों को उम्मीदवार बनाने में सबसे आगे कांग्रेस और बीजेपी है ।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट की दागी राजनेताओ पर नयी नकेल क्या राजनीतिक व्यवस्था को पाक साफ वाकई बना देगी या आपराधिक छवि के नेताओं में कोई डर पैदा करेगी। या फिर राजनेताओं की राजनीति का अहम हिस्सा अब नीचली अदालत से दो बरस सजा ना पाने का होगा या सत्ताधारियो की राजनीति का अहम हिस्सा विरोधियों को दो बरस की सजा दिलवाने का होगा। क्या हालात ऐसे भी आ सकते हैं। यह सवाल इसलिये क्योंकि ना पुलिस सुधार ना अदालती फैसलों में तेजी से निपटारा और ना चुनाव आयोग के फैसलों पर संसद का ठप्पा। बावजूद इसके राजनेता सुधर जायें या सत्ता की होड़ में अपराध रुक जाये क्या यह संभव है। सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले ने अब यह सवाल बड़ा कर दिया है कि अगर किसी दागी राजनेता के आगे पुलिस या जांच एजेंसी नतमस्तक है। अगर निचली अदालत के फैसले उपरी अदालत में और हाईकोर्ट के फैसले सुप्रीम कोर्ट में बदल जाते हो तो फिर दोषी के दोष को सही माना कब जाये। साथ ही संसद अगर चुनाव आयोग के उस फैसले को ही नकारात्मक मान लें, जहां वोटरों के सामने किसी भी उम्मीदवार को वोट ना देने का विकल्प हो।
तो फिर खोट है कहां क्योंकि शिबूसोरेन को दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट दोषी करार देते हुये तुरंत गिरफ्तारी का आदेश देती है और जयललिता को तमिलनाडु की निचली अदालत दोषी करार देते हुये उपरी अदालत में अपील करने के लिये तीन महीने का वक्त दे देती है। इसी तर्ज पर राजनेताओं के खिलाफ करीब 70 फीसदी तक पुलिसिया जांच नीचली अदालत से उपरी अदालत तक पहुंचते पहुंचते उलट हो जाती है । यह सारे सवाल अब नये सिरे से इसलिये महत्वपूर्म हो गये है क्योकि ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक चुने हुये प्रतिनिधियो की तादाद 36 लाख 60 हजार 868 है । और इस कतार में शामिल होने के लिये करोडो नेता गांव से लेकर दिल्ली के रायसीना हिल्स के चक्कर लगाते है । और सभी नेता बनने के लिये अपने अपने घेरे मे आम आदमी की औसत कमाई से सिर्फ 4000 से 5000 फिसदी रुपया ज्यादा खर्च करते है ।
सवाल यही है कि जब रुपये पर ही जीत हार जा टिकी है तो फिर कोई भी नेता कमाई करने के लिये ही चुनाव लडेगा । और कमाई का मतलब होगा आय से ज्यादा संपत्ति । संयोग देखिये जिसके कटघरे में जयललिता, मुलायम और मायावती तीनों ही खड़े हैं। और तीनों में से किसी को भी आने वाले वक्त में सजा हो गई तो जयलिलता की तो कुर्सी जायेगी मुलायम और मायावती 2014 के चुनावी रेस से ही बाहर हो जायेंगे। और फैसला ना आये इसके लिये नेता किसी भी हद तक जाने से चुकेंगे नहीं। ऐसे में न्यापालिका या संसदीय व्यवस्था पर अंगुली उठाने वाली जनता को सड़क पर आकर सुधार या बदलाव की बयार तो बहानी ही होगी। याद कीजिये साल भर पहले देश ने पहली बार राजनेताओं के खिलाफ आम लोगों का आक्रोश सड़क पर देखा भी और सड़क से संसद को चुनौती भी दी। और उस वक्त देश के मिजाज से इतर तमाम राजनीतिक दल ही पार्टी लाइन छोड़कर एक साथ खड़े हो गये, जिससे सांसदों पर आंच ना आये। उस वक्त आपराधिक छवि वाले सांसदों से लेकर आदालतों की लेट लतीफी और सत्ताधारियों के पक्ष में फैसलो को लेकर सवाल उठ रहे थे।
असल में सुप्रीम कोर्ट ने जिस राजनीतिक व्यवस्था को साफ सुधरा बनाने की सोची है उसे साफ सुधरा बनना तो संसद का ही काम है। लेकिन सांसद खुद कितने दागदार हैं, इसकी एक मिसाल नेशनल इलेक्शन वाच ने अपनी जांच के बाद रखी। मौजूदा लोकसभा में 162 सांसद दागी है। 76 सांसदों के खिलाफ कड़े आपराधिक मुकदमे पेंडिंग पड़े हैं।
मुश्किल सिर्फ सांसद विधायकों के आपराधिक छवि के होने भर का नहीं है। सवाल है कि जिस जनता की नुमाइन्दी राजनेता करते हैं, उससे इनका कोई सरोकार कितनी दूर तक नहीं है यह विशेषाधिकार पाये सांसदो के हालात को देखकर भी समझा जा सकता है। देश में एक फिसदी से भी कम करोड़पति है। लेकिन संसद में 58 फीसदी करोड़पति है। औसतन देश में आर्थिक विकास दर 6 फीसदी से ज्यादा होती नहीं है लेकिन सांसदो की कमाई सालाना 200 फीसदी की दर से बढ़ती है। मुश्किल यह है कि राजनेताओं को लेकर सड़क पर जनता का आक्रोश अब सिल्वर स्क्रीन के लिये भी मुनाफे वाली थीम हो चुकी है और सिनेमायी पर्दे पर फिल्म पान सिंह तोमर में सांसदों को डकैत कहा गया तो जनता ने तालियां पीटीं और अब फिल्म सत्याग्रह में सांसद अपनी कमाई के तर्क को सिल्वर स्क्रीन पर कुछ इस तरह गढ़ते नजर आ रहे हैं, जैसे वह जनता के नुमाइंदे नहीं बल्कि कारपोरेट हैं। सुधार यही है कि पान सिंह तोमर को ऱाष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया और सत्याग्रह को भी वही सरकार संभवत: राष्ट्रीय पुरस्कार देगी, जिस पर सवालिया निशान लग रहे हैं।
Sunday, 2 June 2013
सब कुछ लुटा के होश में आये?????? तो क्या हुआ?
परिवार, परिवर्तन या पद। चाहिये क्या । पटना के गांधी मैदान में पटे पड़े पोस्टर को देख कर हर किसी ने कहा परिवार। पोस्टर को पढ़ा तो हर किसी को लगा बात तो परिवर्तन की हो रही है। और जब भाषण हुआ तो लगा लड़ाई तो सत्ता की है, पद पाने की है। पटना के गांधी मैदान ने इतिहास बनते हुये भी देखा है और बने हुये इतिहास को गर्त में समाते हुये भी देखा है। लेकिन पहली बार गांधी मैदान ने जाना समझा कि वक्त जब बदलता है तो संघर्ष के बाद परिवर्तन से ज्यादा संघर्ष करते हुये नजर आना ही महत्वपूर्ण हो जाता है। यह सवाल लालू यादव के लिये इसलिये है क्योंकि कभी जेपी के दांये-बांये खड़े होकर लालू और नीतीश दोनों ने इंदिरा गांधी को घमंडी और तानाशाह कहते हुये जेपी की बातों पर खूब तालियां बजायी हैं। और सत्ता में खोते देश में सत्ता के लिये हर संघर्ष करने वाले को सत्ताधारी अब तानाशाह और घमंडी नजर आने लगा है। यह सच भी है कि कमोवेश हर सत्ताधारी तानाशाह और घमंडी हो चला है। लेकिन इसे तोड़ने के लिये क्या वाकई कोई राजनीतिक संघर्ष हो रहा है। असल में लालू यही चूक रहे हैं और नीतिश इसी का लाभ उठा रहे हैं। दरअसल, इतिहास के पन्नों को टटोलें तो पटना के गांधी मैदान में लालू यादव और नीतिश कुमार ने 1974 से 1994 तक एक साथ संघर्ष किया। और अब इसी गांधी मैदान से नीतिश की सत्ता डिगाने के लिये लालू यादव अपने बेटे की सियासी ताजपोशी करते दिखे।
और गांधी मैदान जो बिहार ही नहीं देश की बदलती सियासत का गवाह रहा है, उसे एक बार फिर उसे संघर्ष में सत्ता पाने का लेप लगते हुये देखना पड़ा। क्योंकि जेपी और कर्पूरी ठाकुर के दौर में नाते-शिश्तेदारों के खिलाफ राजनीतिक जमीन पर खड़े होकर संघर्ष करने की मुनादी करने वाले लालू यादव कितना बदले इसकी हवा परिवर्तन रैली में बहेगी। परिवर्तन की नयी बयार बिहार की सियासत के लिये इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी तक सत्ता के लिये लालू का हर संघर्ष नीतिश की सत्ता को ही मजबूत करता रहा है। और नीतिश हमेशा ठहाका लगाकर यह कहने से नहीं चूकते कि मुझे हटाकर क्या लालू की सत्ता चाहते हैं। और बिहार की जनता खामोशी से नीतिश धर्म को ही बेहतर मान चुप हो जाती है। लेकिन इस बार लालू का वार दोहरा है, जिसमें वह खुद को माइनस कर चलते दिखे और गांधी मैदान में युवा बिहार के लिये अपने बेटों के जरीये विकल्प का सवाल उठाते दिखे तो मोदी के डंक को मुस्लिमो को चुभाकर नीतिश के आरएसएस के गोद में बैठने की बात भी कह गये।
लेकिन लालू की सबसे बड़ी मुश्किल वही कांग्रेस है, जिसकी पीठ पर सवार होकर उन्होंने दिल्ली की सत्ता का स्वाद भी लिया। अब वही कांग्रेस लालू को पीठ दिखा कर नीतिश को साधने में जुटी है। और लालू के पास इसका जवाब नहीं है जबकि कभी जेपी ने गांधी मैदान में जब नारा लगाया था इंदिरा हटाओ देश बचाओ तब लालू जेपी के साथ खड़े थे। ऐसे मोड़ पर गांधी मैदान परिवर्तन की गूंज कैसे सुन पायेगा और परिवर्तन के नाम पर सिर्फ भीड भड़क्का को ही देखकर इतना ही कह पा रहा है कि लालू का मिथ टूटा नहीं है। क्योंकि भरी दोपहरी और फसल में फंसे किसान-मजदूरों के बीच भी रैली हो गई। यह अलग बात है कि रैली ने यह संदेश भी दे दिया कि बिहार परिवर्तन चाहता है और उसे विकल्प की खोज है। लेकिन कोई परिवार, परिवर्तन या पद के नाम पर गांधी मैदान के जरीये बिहार को ठग नहीं सकता है।
और गांधी मैदान जो बिहार ही नहीं देश की बदलती सियासत का गवाह रहा है, उसे एक बार फिर उसे संघर्ष में सत्ता पाने का लेप लगते हुये देखना पड़ा। क्योंकि जेपी और कर्पूरी ठाकुर के दौर में नाते-शिश्तेदारों के खिलाफ राजनीतिक जमीन पर खड़े होकर संघर्ष करने की मुनादी करने वाले लालू यादव कितना बदले इसकी हवा परिवर्तन रैली में बहेगी। परिवर्तन की नयी बयार बिहार की सियासत के लिये इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी तक सत्ता के लिये लालू का हर संघर्ष नीतिश की सत्ता को ही मजबूत करता रहा है। और नीतिश हमेशा ठहाका लगाकर यह कहने से नहीं चूकते कि मुझे हटाकर क्या लालू की सत्ता चाहते हैं। और बिहार की जनता खामोशी से नीतिश धर्म को ही बेहतर मान चुप हो जाती है। लेकिन इस बार लालू का वार दोहरा है, जिसमें वह खुद को माइनस कर चलते दिखे और गांधी मैदान में युवा बिहार के लिये अपने बेटों के जरीये विकल्प का सवाल उठाते दिखे तो मोदी के डंक को मुस्लिमो को चुभाकर नीतिश के आरएसएस के गोद में बैठने की बात भी कह गये।
लेकिन लालू की सबसे बड़ी मुश्किल वही कांग्रेस है, जिसकी पीठ पर सवार होकर उन्होंने दिल्ली की सत्ता का स्वाद भी लिया। अब वही कांग्रेस लालू को पीठ दिखा कर नीतिश को साधने में जुटी है। और लालू के पास इसका जवाब नहीं है जबकि कभी जेपी ने गांधी मैदान में जब नारा लगाया था इंदिरा हटाओ देश बचाओ तब लालू जेपी के साथ खड़े थे। ऐसे मोड़ पर गांधी मैदान परिवर्तन की गूंज कैसे सुन पायेगा और परिवर्तन के नाम पर सिर्फ भीड भड़क्का को ही देखकर इतना ही कह पा रहा है कि लालू का मिथ टूटा नहीं है। क्योंकि भरी दोपहरी और फसल में फंसे किसान-मजदूरों के बीच भी रैली हो गई। यह अलग बात है कि रैली ने यह संदेश भी दे दिया कि बिहार परिवर्तन चाहता है और उसे विकल्प की खोज है। लेकिन कोई परिवार, परिवर्तन या पद के नाम पर गांधी मैदान के जरीये बिहार को ठग नहीं सकता है।
Tuesday, 3 July 2012
मुलायम- कितने समाजवादी ?
लोकसभा चुनाव के ऐलान से करीब चार घंटे पहले यानी मुलायम सिंह जब दस जनपथ में सोनिया गांधी से मुलाकात कर बाहर आये तो अपने कुर्ते के भीतर पसीने को सुखाने के लिये मुंह से हवा कर रहे थे। पत्रकारों ने पूछा, कांग्रेस से गठबंधन होगा या नहीं... तो बदन सुखाते मुलायम झिड़क उठे... होगा क्यों नहीं गठबंधन? सब ठीक होगा!
यह वही मुलायम हैं, जिन्हे रतन सिंह, अभय सिंह, राजपाल और शिवपाल की जगह अखाड़े में ले जाने के लिये पिता ने चुना था। वो खुद मुलायम की वर्जिश करते और दंगल में जब मुलायम बड़े-बड़े पहलवानों को चित्त कर देते तो बेटे की मिट्टी से सनी देह से लिपट जाते और उसमें से आती पसीने की गंध को ही मुलायम की असल पूंजी बताते। इस पूंजी का एहसास लोहिया ने 1954 में मुलायम को तब करवाया, जब उत्तर प्रदेश में सिंचाई दर बढ़वाने के लिये किसान आंदोलन छेड़ा गया। लोहिया इटावा पहुँचे और वहाँ स्कूली छात्र भी मोर्चा निकालने लगे। मुलायम स्कूली बच्चों में सबसे आगे रहते। लोहिया ने स्कूली बच्चों को समझाया कि पढ़ाई जरुरी है लेकिन जब किसान को पूरा हक ही नहीं मिलेगा तो पढ़ाई कर के क्या होगा। इसलिये पसीना तो बहाना ही होगा। लेकिन लोहिया से मुलायम की सीधी मुलाकात 1966 में हुई। तब राजनीतिक कद बना चुके मुलायम को देखकर लोहिया ने कल का भविष्य बताते हुये उनकी पीठ ठोंकी और कांग्रेस के खिलाफ जारी आंदोलन को तेज करने का पाठ यह कह कर पढ़ाया कि कांग्रेस को साधना जिस दिन सीख लोगे उस दिन आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकेगा।
मुलायम ने 1967 में जसवंतनगर विधानसभा में कांग्रेस के दिग्गज लाखन सिंह को चुनाव में चित्त कर कांग्रेस को साधना भी साबित भी कर दिया। लेकिन 2 मार्च को सोनिया गांधी से मुलाकात कर 10 जनपथ से बाहर निकले मुलायम को देखकर यही लगा कि उनकी राजनीति 360 डिग्री में घूम चुकी है। मुलायम जिस राजनीति को साधते हुये कांग्रेस के दरवाजे पर पहुँचे हैं, असल में वह राजनीति देश में उस वक्त की पहचान है, जब गांधीवादी प्रयोग अपनी सार्थकता खो चुके हैं। मार्क्सवादी क्रांति की बातों से खुद ही बोरियत महसूस करने लगे हैं। राजनीतिक दलों का क्षेत्रीयकरण हो चुका है। क्षेत्रिय-भाषाई-जातिगत नेता सौदेबाजी में राजनीतिक मुनाफा बटोर रहे हैं। सत्ता और आर्थिक लाभों का संघर्ष सामाजिक क्षेणी में पहले से जमी जातियों के हाथो से निकल कर हर निचले-पिछडी जातियो के दायरे में जा पहुंचा है। सत्ता के लाभ की आंकाक्षा का दायरा ब्राह्मण से लेकर दलित के सोशल इंजियरिंग के अक्स में देखा-परखा जा रहा है। यानी संसदीय राजनीति का वह पाखंड, जिसे लोकतंत्र के नाम पर राजनेता जिलाये रखते रहे, वह टूट चुका है। ऐसे में मुलायम की लोहिया से सोनिया के दरवाजे तक की यात्रा के मर्म को समझना होगा।
मुलायम सिंह ने 1992 में यह कहते हुये लोहिया के गैर कांग्रेसवाद की थ्योरी को बदला था कि "..अब राजनीति में गैरकांग्रेसवाद के लिये कोई गुंजाइश नहीं रह गई है। कांग्रेस की चौधराहट खत्म करने के लिये डा लोहिया ने यह कार्यनीतिक औजार 1967 में विकसित किया था।....अब कांग्रेस की सत्ता पर इजारेदारी का क्षय हो चुका है । इसलिये राजनीति में गैर कांग्रेसवाद की कोई जगह नहीं है। इसका स्थान गैरभाजपावाद ने ले लिया है।" उत्तर प्रदेश की राजनीतिक जमीन पर समाजवादी पार्टी के जरीये बीजेपी को शिकस्त देकर बीएसपी के साथ सत्ता पाने के खेल में जातीय राजनीति को खुलकर हवा देते हुये मुलायम ने उस जातीय राजनीति में सेंध लगाने की कोशिश भी कि जो जातीय आधार पर बीएसपी को मजबूत किये हुये थी। उस वक्त मुलायम ने अतिपिछड़ी जातियों मसलन गडरिया, नाई, सैनी, कश्यप और जुलाहों से एकजुट हो जाने की अपील करते हुये बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर और चरण सिंह सरीखे नेताओं का नाम लेकर कहा कि, "कर्पूरी ठाकुर की जात के कितने लोग बिहार में रहे होगे लेकिन वह सबसे बड़े नेता बने। दो बार सीएम भी बने। चरण सिंह तो सीएम-पीएम दोनो बने। वजह उनकी जाति नहीं थी। बाबू राजेन्द्र प्रसाद अपने बूते राष्ट्रपति बने। जेपी हो या लोहिया कोई अपनी जाति के भरोसे नेता नहीं बना। राजनारायण भी जाति से परे थे।"
मुलायम उस दौर में समझ रहे थे कि एक तरफ बीजेपी है दूसरी तरफ बीएसपी यानी जातियों की राजनीतिक गोलबंदी करते हुये उन्हे राष्ट्रीय राजनीति के लिये जातियों की गोलबंदी से परे जाने की राजनीति को भी समझना और समझाना होगा। लेकिन 1993 में बीएसपी के सहयोग से बीजेपी को हरा कर इतिहास रचने के बाद मुलायम को समझ में आ गया कि उत्तर प्रदेश में सवर्ण मतदाताओ को ध्रुवीकरण के लिये बीजेपी के पाले में नहीं छोड़ा जा सकता है । इस स्थिति को मुलायम ने पहले समझा जरुर लेकिन मायावती ने इसका प्रयोग पहले किया। क्योकि सपा-बीएसपी दोनों ने देखा कि जैसे ही वह सामाजिक ध्रुवीकरण की वजह से साथ हुये उसकी प्रतिक्रिया में ब्रहाण वोट फौरन हिन्दुत्व ध्रुव में चले जाते हैं। ऐसे में, बीएसपी ने जब मुलायम का दामन छोड़ा तो बीजेपी का दामन थाम कर उस जातीय गोलबंदी के अपने बनाये मिथ को ही तोड़ने की कोशिश की जो मनुवाद के नाम पर बीजेपी या उच्च जाति को राजनीतिक तौर पर खारिज करती थी। हालाँकि मुलायम बीएसपी के इस प्रयोग को झटके में समझ नहीं पाये इसलिये बीएसपी-बीजेपी के साथ आने पर कहा "...अब बसपा क्या कहेगी? क्या वह अब भी भाजपा को मनुवादी या सांप्रदायिक कह सकेगी? ....मुसलमानों को फिर सोचना होगा उन्हें लगातार धोखा दिया गया है। इसलिये अब हर मोर्चे पर मैदान साफ हो गया है। अब सेक्यूलर और कम्यूनल शक्तियों की लड़ाईं साफ है।"
लेकिन राजनीति का जातीय गणित मुलायम को इसकी भी चेतावनी देता रहा कि सेक्यूलर बनाम कम्यूनल की लड़ाई का मतलब कांग्रेस को भी रिंग के भीतर लाना होगा। ऐसे में दलित-अयोध्या-मुसलमान-विकास की चौकड़ी के महामंत्र का सिलसिलेवार तरीके से जाप की रणनीति ही मुलायम की राजनीति का औजार बनी। इस महामंत्र के बडे औजार कल्य़ाण सिंह आज से नहीं मुलायम के लिये डेढ़ दशक से निशाने पर है। 1995 में बीजेपी ने जब कांशीराम को फुसला कर सपा-बसपा गठजोड़ तोड़ दिया तो विधानसभा में मुलायम ने कल्याण सिंह से पूछा कि , "कहिये अब आपके क्या हाल है। मुलायम ने विपक्ष के नेता की खाली पड़ी कुर्सी की तरफ इशारा करके कहा कि आप वहा से उठकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना चाहते थे, लेकिन आप न तो वहा पहुंच पाये और विपक्ष के नेता की कुर्सी भी चली गयी। आमतौर पर वाकपटु कल्याण भी इस कटाक्ष का कोई जबाब नही देपाये और खामोश रहे।"
कल्याण को लगातार टटोलते मुलायम ने डिबाई उपचुनाव में भी उनके मर्म को छुआ। उन्होंने अपने लोध उम्मीदवार को जिताने की अपील करते हुये जो भाषण दिया उसके जरिये एक नयी राजनीतिक लकीर खींच दी। मुलायम ने कहा, "अगर कल्याण सिंह की इज्जत बचाना चाहते हो तो सपा को जिताओ। जब तक मैं मजबूत रहूंगा तभी तक कल्याण सिंह की इज्जत है। भाजपा में उनकी पूछ तभी तक है।" यानी कम्यूनल कल्याण हो या दलित राजनीति के सिरमौर कांशीराम, मुलायम ने दोनो को साधा। 1985 में इटावा से कांशीराम को मुलायम की राजनीति ने ही जिताया। दलित-मुसलमान-पिछड़े गठजोड़ की राजनीति में बीजेपी के सवर्ण वोटबैक को जोड़ने का खेल भी मुलायम ने ही खेला। यानी संसदीय राजनीति में विचारधारा से इतर समीकरण को ही वैचारिक आधार दे कर सत्ता कैसे बनायी जा सकती है, इसका पाठ पढ़ाने में कोई चूक मुलायम ने नहीं की। जो राजनीति मौजूद है, उसमे लालू यादव से लेकर पवार और जयललिता से लेकर ममता बनर्जी के राजनीतिक तौर-तरीके महज एक हिस्सा भर है। क्योंकि तमाम राजनीतिक दलों ने संसदीय राजनीति के अंतर्विरोध का लाभ उठाकर पार्टी का विस्तार किया तो उसकी विंसगतियों को ही राजनीतिक औजार बनाकर नेताओ ने अपना कद बढ़ाया है।
वहीं, मुलायम का राजनीतिक प्रयोग राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों का ऐसा आईना है, जिसमें लोहिया से सोनिया तक की यात्रा सत्ता की आंकाक्षा में ही सिमटे और सत्ता ही हर विचारधारा और व्यवस्था हो जाये।
यह वही मुलायम हैं, जिन्हे रतन सिंह, अभय सिंह, राजपाल और शिवपाल की जगह अखाड़े में ले जाने के लिये पिता ने चुना था। वो खुद मुलायम की वर्जिश करते और दंगल में जब मुलायम बड़े-बड़े पहलवानों को चित्त कर देते तो बेटे की मिट्टी से सनी देह से लिपट जाते और उसमें से आती पसीने की गंध को ही मुलायम की असल पूंजी बताते। इस पूंजी का एहसास लोहिया ने 1954 में मुलायम को तब करवाया, जब उत्तर प्रदेश में सिंचाई दर बढ़वाने के लिये किसान आंदोलन छेड़ा गया। लोहिया इटावा पहुँचे और वहाँ स्कूली छात्र भी मोर्चा निकालने लगे। मुलायम स्कूली बच्चों में सबसे आगे रहते। लोहिया ने स्कूली बच्चों को समझाया कि पढ़ाई जरुरी है लेकिन जब किसान को पूरा हक ही नहीं मिलेगा तो पढ़ाई कर के क्या होगा। इसलिये पसीना तो बहाना ही होगा। लेकिन लोहिया से मुलायम की सीधी मुलाकात 1966 में हुई। तब राजनीतिक कद बना चुके मुलायम को देखकर लोहिया ने कल का भविष्य बताते हुये उनकी पीठ ठोंकी और कांग्रेस के खिलाफ जारी आंदोलन को तेज करने का पाठ यह कह कर पढ़ाया कि कांग्रेस को साधना जिस दिन सीख लोगे उस दिन आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकेगा।
मुलायम ने 1967 में जसवंतनगर विधानसभा में कांग्रेस के दिग्गज लाखन सिंह को चुनाव में चित्त कर कांग्रेस को साधना भी साबित भी कर दिया। लेकिन 2 मार्च को सोनिया गांधी से मुलाकात कर 10 जनपथ से बाहर निकले मुलायम को देखकर यही लगा कि उनकी राजनीति 360 डिग्री में घूम चुकी है। मुलायम जिस राजनीति को साधते हुये कांग्रेस के दरवाजे पर पहुँचे हैं, असल में वह राजनीति देश में उस वक्त की पहचान है, जब गांधीवादी प्रयोग अपनी सार्थकता खो चुके हैं। मार्क्सवादी क्रांति की बातों से खुद ही बोरियत महसूस करने लगे हैं। राजनीतिक दलों का क्षेत्रीयकरण हो चुका है। क्षेत्रिय-भाषाई-जातिगत नेता सौदेबाजी में राजनीतिक मुनाफा बटोर रहे हैं। सत्ता और आर्थिक लाभों का संघर्ष सामाजिक क्षेणी में पहले से जमी जातियों के हाथो से निकल कर हर निचले-पिछडी जातियो के दायरे में जा पहुंचा है। सत्ता के लाभ की आंकाक्षा का दायरा ब्राह्मण से लेकर दलित के सोशल इंजियरिंग के अक्स में देखा-परखा जा रहा है। यानी संसदीय राजनीति का वह पाखंड, जिसे लोकतंत्र के नाम पर राजनेता जिलाये रखते रहे, वह टूट चुका है। ऐसे में मुलायम की लोहिया से सोनिया के दरवाजे तक की यात्रा के मर्म को समझना होगा।
मुलायम सिंह ने 1992 में यह कहते हुये लोहिया के गैर कांग्रेसवाद की थ्योरी को बदला था कि "..अब राजनीति में गैरकांग्रेसवाद के लिये कोई गुंजाइश नहीं रह गई है। कांग्रेस की चौधराहट खत्म करने के लिये डा लोहिया ने यह कार्यनीतिक औजार 1967 में विकसित किया था।....अब कांग्रेस की सत्ता पर इजारेदारी का क्षय हो चुका है । इसलिये राजनीति में गैर कांग्रेसवाद की कोई जगह नहीं है। इसका स्थान गैरभाजपावाद ने ले लिया है।" उत्तर प्रदेश की राजनीतिक जमीन पर समाजवादी पार्टी के जरीये बीजेपी को शिकस्त देकर बीएसपी के साथ सत्ता पाने के खेल में जातीय राजनीति को खुलकर हवा देते हुये मुलायम ने उस जातीय राजनीति में सेंध लगाने की कोशिश भी कि जो जातीय आधार पर बीएसपी को मजबूत किये हुये थी। उस वक्त मुलायम ने अतिपिछड़ी जातियों मसलन गडरिया, नाई, सैनी, कश्यप और जुलाहों से एकजुट हो जाने की अपील करते हुये बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर और चरण सिंह सरीखे नेताओं का नाम लेकर कहा कि, "कर्पूरी ठाकुर की जात के कितने लोग बिहार में रहे होगे लेकिन वह सबसे बड़े नेता बने। दो बार सीएम भी बने। चरण सिंह तो सीएम-पीएम दोनो बने। वजह उनकी जाति नहीं थी। बाबू राजेन्द्र प्रसाद अपने बूते राष्ट्रपति बने। जेपी हो या लोहिया कोई अपनी जाति के भरोसे नेता नहीं बना। राजनारायण भी जाति से परे थे।"
मुलायम उस दौर में समझ रहे थे कि एक तरफ बीजेपी है दूसरी तरफ बीएसपी यानी जातियों की राजनीतिक गोलबंदी करते हुये उन्हे राष्ट्रीय राजनीति के लिये जातियों की गोलबंदी से परे जाने की राजनीति को भी समझना और समझाना होगा। लेकिन 1993 में बीएसपी के सहयोग से बीजेपी को हरा कर इतिहास रचने के बाद मुलायम को समझ में आ गया कि उत्तर प्रदेश में सवर्ण मतदाताओ को ध्रुवीकरण के लिये बीजेपी के पाले में नहीं छोड़ा जा सकता है । इस स्थिति को मुलायम ने पहले समझा जरुर लेकिन मायावती ने इसका प्रयोग पहले किया। क्योकि सपा-बीएसपी दोनों ने देखा कि जैसे ही वह सामाजिक ध्रुवीकरण की वजह से साथ हुये उसकी प्रतिक्रिया में ब्रहाण वोट फौरन हिन्दुत्व ध्रुव में चले जाते हैं। ऐसे में, बीएसपी ने जब मुलायम का दामन छोड़ा तो बीजेपी का दामन थाम कर उस जातीय गोलबंदी के अपने बनाये मिथ को ही तोड़ने की कोशिश की जो मनुवाद के नाम पर बीजेपी या उच्च जाति को राजनीतिक तौर पर खारिज करती थी। हालाँकि मुलायम बीएसपी के इस प्रयोग को झटके में समझ नहीं पाये इसलिये बीएसपी-बीजेपी के साथ आने पर कहा "...अब बसपा क्या कहेगी? क्या वह अब भी भाजपा को मनुवादी या सांप्रदायिक कह सकेगी? ....मुसलमानों को फिर सोचना होगा उन्हें लगातार धोखा दिया गया है। इसलिये अब हर मोर्चे पर मैदान साफ हो गया है। अब सेक्यूलर और कम्यूनल शक्तियों की लड़ाईं साफ है।"
लेकिन राजनीति का जातीय गणित मुलायम को इसकी भी चेतावनी देता रहा कि सेक्यूलर बनाम कम्यूनल की लड़ाई का मतलब कांग्रेस को भी रिंग के भीतर लाना होगा। ऐसे में दलित-अयोध्या-मुसलमान-विकास की चौकड़ी के महामंत्र का सिलसिलेवार तरीके से जाप की रणनीति ही मुलायम की राजनीति का औजार बनी। इस महामंत्र के बडे औजार कल्य़ाण सिंह आज से नहीं मुलायम के लिये डेढ़ दशक से निशाने पर है। 1995 में बीजेपी ने जब कांशीराम को फुसला कर सपा-बसपा गठजोड़ तोड़ दिया तो विधानसभा में मुलायम ने कल्याण सिंह से पूछा कि , "कहिये अब आपके क्या हाल है। मुलायम ने विपक्ष के नेता की खाली पड़ी कुर्सी की तरफ इशारा करके कहा कि आप वहा से उठकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना चाहते थे, लेकिन आप न तो वहा पहुंच पाये और विपक्ष के नेता की कुर्सी भी चली गयी। आमतौर पर वाकपटु कल्याण भी इस कटाक्ष का कोई जबाब नही देपाये और खामोश रहे।"
कल्याण को लगातार टटोलते मुलायम ने डिबाई उपचुनाव में भी उनके मर्म को छुआ। उन्होंने अपने लोध उम्मीदवार को जिताने की अपील करते हुये जो भाषण दिया उसके जरिये एक नयी राजनीतिक लकीर खींच दी। मुलायम ने कहा, "अगर कल्याण सिंह की इज्जत बचाना चाहते हो तो सपा को जिताओ। जब तक मैं मजबूत रहूंगा तभी तक कल्याण सिंह की इज्जत है। भाजपा में उनकी पूछ तभी तक है।" यानी कम्यूनल कल्याण हो या दलित राजनीति के सिरमौर कांशीराम, मुलायम ने दोनो को साधा। 1985 में इटावा से कांशीराम को मुलायम की राजनीति ने ही जिताया। दलित-मुसलमान-पिछड़े गठजोड़ की राजनीति में बीजेपी के सवर्ण वोटबैक को जोड़ने का खेल भी मुलायम ने ही खेला। यानी संसदीय राजनीति में विचारधारा से इतर समीकरण को ही वैचारिक आधार दे कर सत्ता कैसे बनायी जा सकती है, इसका पाठ पढ़ाने में कोई चूक मुलायम ने नहीं की। जो राजनीति मौजूद है, उसमे लालू यादव से लेकर पवार और जयललिता से लेकर ममता बनर्जी के राजनीतिक तौर-तरीके महज एक हिस्सा भर है। क्योंकि तमाम राजनीतिक दलों ने संसदीय राजनीति के अंतर्विरोध का लाभ उठाकर पार्टी का विस्तार किया तो उसकी विंसगतियों को ही राजनीतिक औजार बनाकर नेताओ ने अपना कद बढ़ाया है।
वहीं, मुलायम का राजनीतिक प्रयोग राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों का ऐसा आईना है, जिसमें लोहिया से सोनिया तक की यात्रा सत्ता की आंकाक्षा में ही सिमटे और सत्ता ही हर विचारधारा और व्यवस्था हो जाये।
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